देश, राष्ट्र और त्याग की अवधारणा एक राजनीतिक पाखंड है

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देश, राष्ट्र और त्याग की अवधारणा एक राजनीतिक पाखंड है। त्याग का उपदेश समस्या का कोई हल नहीं है। यह समस्या से पलायन और एक शासक के अयोग्य होने का प्रमाण मात्र हो सकता है।

मोटे तौर पर समस्या का समाधान यह है कि उत्पादन बढ़ाओ। उत्पादन बढ़ाने की प्रक्रिया से रोजगार के अवसरों का सृजन होगा, क्योंकि उत्पादन बढ़ाने के लिए श्रम शक्ति की भी जरूरत पड़ेगी। रोजगार सृजन से लोगों की आय बढ़ेगी और उनकी क्रयशक्ति बढ़ेगी। क्रयशक्ति बढ़ने से उपभोग भी निश्चित रूप से बढ़ेगा। उपभोग बढ़ने से उत्पादन की प्रक्रिया को गति मिलेगी।

जब पैसा प्रवाह में रहेगा तो पूंजी बढ़ेगी। पूंजी बढ़ने पर निवेश और औद्योगीकरण की प्रक्रिया भी तेज गति से बढ़ेगी, क्योंकि पूंजी का स्वभाव ही निवेश के रूप में विस्तार चाहता है। स्थिर होना या ठहराव पूंजी का स्वभाव नहीं है। पुरानी कहावत भी यही कहती है कि लक्ष्मी चंचला होती है, वह एक जगह ठहरती नहीं।

जो पैसा प्रवाह में नहीं होता, उसे ही काला धन कहते हैं। यह काला धन, जो उपयोग में नहीं आता, एक तरह की मृत पूंजी होती है। पूंजी के बढ़ने और प्रवाह में रहने से उद्योगीकरण को बढ़ावा मिलेगा और अर्थव्यवस्था नई ऊंचाइयों को छुएगी।

हमें मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुसलमान जैसे विनाशकारी और आत्मघाती मुद्दों को त्यागने की जरूरत है, न कि उपभोग की वस्तुओं को त्यागने की। त्याग-वैराग्य साधु-संतों का काम है। इस देश की 140 करोड़ जनता कोई साधु-संतों का जमावड़ा नहीं है।

साधु-संत त्याग की बातें करते रहें, लेकिन सच्चाई यह है कि उन्हें भी भौतिक वस्तुओं की जरूरत पड़ती ही है, भले ही उनकी जरूरतें न्यूनतम हों। साधु-संत एक तरह से मृत श्रम शक्ति हैं, जो दूसरों के श्रम पर आश्रित रहते हैं।

इसलिए हमें मंदिर-मस्जिद और हिंदू-मुसलमान की राजनीति करने की बजाय उत्पादन बढ़ाने की योजनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। उत्पादन बढ़ाने के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी और व्यापक स्तर पर बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) की जरूरत होगी। इस प्रक्रिया में श्रम शक्ति का बड़े पैमाने पर उपयोग हो सकेगा।

लेकिन इस देश के शासकों को मंदिर-मस्जिद से फुर्सत कहां है? मंदिर-मस्जिद से न कभी कुछ हुआ है, न कभी कुछ हासिल हो सकता है।

मनुष्य का आध्यात्मिक विकास भी उसकी भौतिक सुख-समृद्धि की ही प्रतिछाया है। बिना भौतिक विकास के आध्यात्मिक विकास की संभावनाएं न के बराबर हो जाती हैं। कहावत भी सही है- “भूखे पेट भजन न होय गोपाला”

मनुष्य मूलतः एक भौतिक प्राणी है। उसकी सभी समस्याएं-भौतिक हों या आध्यात्मिक-मूल रूप से भौतिक ही हैं और उनका समाधान भी भौतिक स्तर पर ही संभव है।

भूखी-नंगी जनता को त्याग का उपदेश देना यह साबित करता है कि देश की अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो चुकी है तथा नेतृत्व आत्ममुग्धता के नशे में चूर है। उसमें दूरदर्शिता, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आर्थिक समझ का घोर अभाव है।

पूंजीवादी व्यवस्था में देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति भी ज्यादातर झूठी धारणाएं हैं। इस व्यवस्था में कोई देश या राष्ट्र के लिए नहीं, बल्कि सर्वप्रथम और अंततः अपने लिए ही काम करता है। देश और राष्ट्र आदमी की प्राथमिकताओं में सबसे अंत में आते हैं।

अदाणी और अंबानी देश या राष्ट्र के लिए काम नहीं करते। उनके सारे मुनाफे उनकी निजी मिल्कियत होते हैं, देश के खाते में नहीं जाते। देश का प्रधान सेवक भी मूलतः अपने ठाठ-बाट, सैर-सपाटे और अपनी पार्टी (बीजेपी-आरएसएस) के लिए काम करता है, देश के लिए नहीं। पूंजीपतियों से मिले चंदे से अर्जित धन पार्टी की संपत्ति बन जाता है, देश की नहीं।

इसलिए राजनेताओं द्वारा देशहित, राष्ट्रहित और त्याग की बातें करना राजनीतिक पाखंड के सिवाय और कुछ नहीं है।