लोहिया: नर-नारी समता का स्वप्नद्रष्टा

डॉ. प्रेम सिंह डॉ. प्रेम सिंह
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डॉ. राममनोहर लोहिया (23 मार्च 1910 – 12 अक्टूबर 1967) जाति और लिंग के दो कटघरों को भारतीयों की आत्मा के पतन और साहसिकता तथा आनंद की समस्त क्षमता खत्म हो जाने का मुख्य कारण मानते हैं। भारत के सांस्कृतिक समाजशास्त्र का अध्ययन करते हुए लोहिया पाते हैं कि ये दोनों कटघरे भारतीय सामाजिक संरचना में बहुत गहराई तक जमे हुए हैं। इन दोनों कटघरों के लंबे समय से मौजूद होने के चलते भारत के लोग “पृथ्वी पर सबसे उदास लोग” बन गए हैं। उनकी राय में भारतीयों की सच्ची चेतना को इन कटघरों को खत्म करके ही उन्मुक्त किया जा सकता है।

अपने संपूर्ण दार्शनिक-राजनीतिक उद्यम में लोहिया केवल एक ही इच्छा से प्रेरित थे-मानव जीवन और विश्व-व्यवस्था के सभी पहलुओं में अधिकतम संभव समानता हासिल करना। वे स्त्री और पुरुष के बीच की असमानता को सबसे बुनियादी और सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं: “नर-नारी की गैर-बराबरी शायद आधार है और सब गैर-बराबरियों के लिए। या आधार नहीं है तो जितने भी आधार हैं, बुनियाद की चट्टानें हैं समाज में गैर-बराबरी की और नाइंसाफी की, उनमें नर-नारी की गैर-बराबरी की चट्टान सबसे बड़ी है।”

लोहिया कहते हैं, “जो लोग यह सोचते हैं कि आधुनिक अर्थतंत्र के द्वारा गरीबी मिटाने के साथ ये कटघरे अपने-आप खत्म हो जाएंगे, बड़ी भारी भूल करते हैं। गरीबी और ये दो कटघरे एक-दूसरे के कीटाणुओं पर पनपते हैं।” इसलिए, लोहिया सुझाव देते हैं कि इन कटघरों, विशेष रूप से लिंग के आधार पर बने कटघरे के विरुद्ध संघर्ष को केवल आर्थिक, राजनीतिक और कानूनी क्षेत्रों तक सीमित न रख कर, इसका विस्तार सांस्कृतिक क्षेत्र तक किया जाना चाहिए।

इस विषय पर वे खुली बहस की वकालत करते हैं, विशेषकर युवाओं के बीच, ताकि पितृसत्तात्मक मानसिकता को बदला जा सके। बदलाव का यह काम उन मिथकों और किंवदंतियों को विखंडित करके   किया जा सकता है, जो एक ‘आदर्श’ स्त्री की धारणाओं को गढ़ते और उनका प्रचार करते हैं। ये मिथक जो पुरुष-हित में स्त्री की मनमानी छवियाँ गढ़ते हैं, पितृसत्तात्मक समाज में रचे और महिमामंडित किए गए हैं। ऐसे मिथकों से मुक्ति केवल खुली बहस के माध्यम से पुरुष की मानसिकता में बदलाव लाकर ही प्राप्त की जा सकती है।

लोहिया उन पारंपरिक मिथकों का विखंडन करके उनके भीतर से नवीन अंतर्वस्तु पैदा करते हैं, जो आधुनिक जीवन के लिए प्रासंगिक और सार्थक है। किसी भी अन्य आधुनिक विचारक ने, असमानता के रूपों से लड़ने के लिए भारतीयों की बद्धमूल सामाजिक-सांस्कृतिक मानसिकता में परिवर्तन की ज़रूरत पर लोहिया जितना बल नहीं दिया। यह बल सबसे ज्यादा लैंगिक संबंधों में निहित गहरी असमानताओं को मिटाने के लक्ष्य पर केंद्रित है। लैंगिक संबंधों में क्रांति (नर-नारी समता) को आधुनिक समाजवादी समाज की स्थापना की खोज में लोहिया द्वारा प्रतिपादित ‘सप्तक्रांति’ का सबसे महत्वपूर्ण आयाम माना जा सकता है। इस शानदार लक्ष्य को पाने के लिए वे पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज़्यादा जगह और संसाधन दिए जाने में भी कोई संकोच नहीं करते।

लोहिया के अद्वितीय स्त्री-विमर्श में समाज के सभी वर्गों की स्त्रियों की स्थिति का दिलचस्प विश्लेषण मिलता है, जिसमें निम्न वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक, और एशिया से लेकर यूरोप-अमेरिका तक की स्त्रियाँ शामिल हैं। वे मानते हैं कि यूरोपीय या अमेरिकी स्त्रियों की तुलना में एशियाई स्त्रियाँ पारंपरिक रूप से असमानता एवं अवमानना की अधिक शिकार रही हैं। इसके प्रमाण में वे केवल एशिया में  प्रचलित बहु-विवाह की प्रथा का उदाहरण देते हैं।

लोहिया के स्त्री-विमर्श का मुख्य क्षेत्र हिंदू समाज है। हालाँकि, वे मुस्लिम स्त्रियों के जीवन का भी प्रसंगवश उल्लेख करते हैं। लोहिया ने मुस्लिम समाज में मान्य चार पत्नी रखने की प्रथा का विरोध दो आधारों पर किया है – एक तो पुरुष चारों पत्नियों के साथ कभी भी बराबरी का व्यवहार नहीं कर सकता, जैसा कि ‘शरीयत’ में हिदायत है; दूसरे इस्लाम में स्त्री को चार पति रखने की इजाजत नहीं दी गई है। अगर पैगम्बर ने तत्कालीन समाज में स्त्रियों की अधिक आबादी के चलते यह व्यवस्था दी थी, जैसा कि तर्क दिया जाता है, तो लोहिया के मत में मौजूदा परिदृश्य में इस व्यवस्था को निरस्त किया जाना चाहिए।

लोहिया प्रसिद्ध बहस छेड़ते हैं कि आधुनिक भारतीय स्त्री का आदर्श कौन हो – द्रौपदी या सावित्री? वे कहते हैं, “जब में कहा करता हूँ कि द्रौपदी हिन्दुस्तान की सच्चे माने में प्रतीक है, सावित्री उसके जितनी नहीं, तब इसी अंग को देखकर कहता हूँ कि वह ज्ञानी, समझदार, बहादुर, हिम्मतवाली, हाजिर जवाब थी। न सिर्फ हिन्दुस्तान में बल्कि दुनिया में मुझे द्रौपदी जैसी और कोई औरत नहीं मिलती। … केवल एक पातिव्रत धर्म के कारण सावित्री को इतना सिर पर उठा लिया करते हो, यह तो बहुत ही अनुचित चीज है।”

उनके विचार में, “शायद वह दुनिया अच्छी होगी जिसमें एक पति और एक पत्नी हो।” लेकिन वे पातिव्रत धर्म के एकांगी गुण के आधार पर स्त्री का आदर्श प्रतीक गढ़ने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है, “सावित्री के किस्से को मैं खराब नहीं कहता हूँ, न सावित्री की नाकदरी करता हूँ। सावित्री की में बड़ी भारी कदर करता हूँ, सिर्फ एक अंग में। लेकिन औरत का एक अंग ही नहीं होता। उसके बीसों अंग होते हैं। अगर उस एक अंग को पनपाने में बाकी उन्नीस अंग नष्ट हो जाते हों या वे खतरे में पड़ जाते हों, तो फिर उसको आदर्श बनाना मुश्किल हो जाता है।”

भारत में, उसकी पाँच बेटियों – सीता, सावित्री, द्रौपदी, तारा, मंदोदरी – को सम्मान दिया जाता है। लेकिन इन पाँचों में धुरी सावित्री ही है। द्रौपदी के प्रति इज्जत का भाव नहीं मिलता। लोहिया सावित्री वाली धुरी को बदल कर वहाँ द्रौपदी को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं।

सभी समाजों में स्त्री यौन-शुचिता एक संवेदनशील और साथ ही समस्यात्मक मुद्दा रहा है। पुरुष द्वारा स्वीकृत और स्थापित यौन-शुचिता के मूल्य ने स्त्री-स्वातंत्र्य को शायद सर्वाधिक गहरे में बाधित किया है। लोहिया के मुताबिक इस मान्यता के चलते स्त्री या तो जीवन-भर के लिए कुंठित होती है, या आत्महत्या करती है, या सती होती है, या सारी उम्र विधवा के रूप में काटती है या वेश्या बनने को बाध्य होती है।

लोहिया के स्त्री-विमर्श में सर्वाधिक विस्फोटक इसी ‘मूल्य’ को उड़ाने के लिए जुटाया गया है: “हिन्दुस्तान आज विकृत हो गया है, यौन-पवित्रता की लम्बी-चौड़ी बातों के बावजूद, आमतौर पर विवाह और यौन के संबंध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं। सारे संसार में कभी-कभी मर्द ने नारी के संबंध में शुचिता, शुद्धता, पवित्रता के बड़े लम्बे-चौड़े आदर्श बनाए हैं। घूम-फिरकर इन आदर्शों का संबंध शरीर तक सिमट जाता है, और शरीर के भी छोटे-से हिस्से पर।”

लोहिया ने स्त्री-सत्ता के विविध पहलुओं – स्त्री-पुरुष की प्राकृतिक बनावट, दोनों के बीच दोस्ती अथवा पति-पत्नी का रिश्ता, तलाक, संतानोत्पत्ति आदि – पर नवीन नैतिक धरातल से विचार किया है। सामंती और पूंजीवादी दोनों तरह की बेड़ियों से स्त्री को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने जिन साहसिक कदमों की वकालत की है, वे आज के पुनरुत्थानवादी और उपभोक्तावादी माहौल में तो अकल्पनीय ही हैं। आज की नवउदारवादी अथवा कॉर्पोरेट राजनीति के दौर में भारतीय स्त्री की स्थिति की तुलना लोहिया के विचारों से की जाए तो मन में गहरी निराशा का भाव जागता है। उसकी सत्ता को महज़ एक ऐसे वोट तक सीमित कर दिया गया है जिसे चुनाव से पहले अपनी मर्ज़ी से मोड़ा या खरीदा जा सकता है।

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फ़ेलो हैं।)