तीसरी प्रकृति से डरी बेचारी मर्दानगी

योगेन्द्र यादव
मत-विमत Updated On :

चलिए, ट्रांसजेंडर कानून में हुए संशोधन की बात “कामसूत्र” से शुरू करते हैं। संस्कृत साहित्य के इस कालजयी ग्रंथ (अधिकरण 2, अध्याय 9) में स्त्री और पुरुष के अलावा एक “तृतीया प्रकृति” का जिक्र किया गया है। गौर कीजिए, वात्स्यायन के अनुसार यह मामला ‘प्रकृति’ यानी स्वभाव या मनोवृत्ति का है, शरीर की लैंगिक बनावट का नहीं। इस तीसरी श्रेणी में वो लोग आते हैं जिनका शरीर तो पुरुष जैसा है लेकिन जिनका मन और हाव-भाव या तो ‘स्त्रीरूपिणी’ है, या कम से कम वो नहीं है जिसे समाज पुरुष के रूप में पहचानता है। या वो जो पैदाइश से लड़की मानी गई, लेकिन जिनका आचार-व्यवहार स्त्री के लिए बनाये खांचे में फिट नहीं करता। यह भी गौर कीजिए कि वात्स्यायन इस तीसरी प्रकृति को किसी बीमारी या विकार की तरह देखने की बजाय बस एक अन्य श्रेणी की तरह दर्ज करते हैं।

मतलब यह कि ट्रांसजेंडर शब्द भले ही नया हो, लेकिन पश्चिमी संस्कृति से संपर्क से सैकड़ों साल पहले हमारे यहाँ इस बात की कमोबेश सहज स्वीकारोक्ति थी कि कुछ लोग तन से और कुछ लोग मन से पुरुष बनाम स्त्री के दो डब्बों में क़ैद नहीं हो सकते। हमारी भाषाओं और परंपराओं में अनगिनत कथाएं और मिसाल यह साबित करते हैं कि लैंगिक विविधता का विचार हमारे यहाँ कहीं बाहर से नहीं आया।

दरअसल पश्चिमी संस्कृति से संपर्क ने तो उलटा असर डाला। औपनिवेशिक संस्कृति के वर्चस्व के चलते हमने इस लैंगिक विविधता के प्रति शर्म महसूस करनी शुरू की और अंग्रेजों के विक्टोरियन अंदाज़ की नक़ल करते हुए ऐसे सामाजिक आदर्श बनाये जिसमें ‘तीसरी प्रकृति’ के लिए जगह नहीं थी। यही नहीं, ब्रिटेन की तरह हमारे यहाँ भी ऐसे क़ानून बनाये गए जो स्त्री-पुरुष के एकरूपी संबंध से हटकर हर संबंध और हर आचार-व्यवहार को ग़ैर क़ानूनी बना देता था। सामाजिक बंदिशों और क़ानूनी बेड़ियों की इस ज़ालिम मिलावट ने ना जाने कितने खूबसूरत रिश्तों को पाप में बदल दिया, ना जाने कितने अरमानों का गला घोंटा, ना जाने कितनी जिंदगियों को नर्क बना दिया या इस घुटन के चलते अपनी जिंदगी खत्म करने पर मजबूर किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एक ऐतिहासिक फैसले से इस ऐतिहासिक अन्याय पर रोक लगाई। “राष्ट्रीय विधि सेवा प्राधिकरण (नालसा) बनाम भारत सरकार” नामक इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीसरी प्रकृति’ को क़ानूनी मान्यता दे दी। इसमें सिर्फ़ उभयलिंगी (जिनके शरीर में नर और मादा दोनों के लक्षण हों) और हिजड़ा, किन्नर, अरावनी, जोगता ही शामिल नहीं थे, बल्कि वो सब जो इसमें शामिल होना चाहें। जो अपने आप को ना मर्द समझते हैं ना औरत, उन्हें यह क़ानूनी अधिकार दिया गया कि वो अपने आप को इन दोनों से हट कर ट्रांसजेंडर या “अन्य” की तरह दर्ज करवायें। कोर्ट ने सरकार को हिदायत दी कि वो इस तीसरी प्रकृति को मान्यता दे, इनके ख़िलाफ़ होने वाले किसी भी भेदभाव पर पाबंदी लगाये और अन्य अनेक पिछड़े और प्रताड़ित समुदायों की तरह इस वर्ग की बेहतरी के लिए भी इंतज़ाम करे।

अंततः पाँच साल बाद संसद ने इस आशय का क़ानून बनाया। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने उस परिभाषा को स्वीकार किया जिसे विश्व स्वास्थ्य संघ पहले ही निरूपित कर चुका था-ट्रांसजेंडर की श्रेणी में हर वो व्यक्ति आता है जिसके अनुसार उसका लिंग अपने जन्म के समय निरूपित लिंग से भिन्न है। मतलब यह हर व्यक्ति अपनी लैंगिक प्रकृति का चुनाव ख़ुद कर सकता है।

आप सोचेंगे देर आयद दुरुस्त आयद। कौन अपने आपको मर्द माने, कौन औरत माने और कौन इन दोनों से हट कर-इसमें किसी का क्या जाता है? वैसे भी इस क़ानून के तहत अभी बहुत कुछ हुआ भी नहीं है। हालाँकि विशेषज्ञों के अनुसार देश में पचास लाख से एक करोड़ के बीच ट्रांसजेंडर व्यक्ति हैं ( उनमें से 2011 की जनगणना में कोई पाँच लाख व्यक्तियों ने अपने आप को “अन्य” में दर्ज करवाया था), मगर अभी तक सिर्फ़ 32 हज़ार को ही औपचारिक पहचान पत्र दिए गए हैं। लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि इसे ठीक से लागू करने से पहले ही इसे वापिस पलट दिया गया।

पिछले हफ़्ते संसद ने इस क़ानून में संशोधन के नाम पर इसे ख़त्म कर दिया। इस क़ानून की आत्मा थी ट्रांसजेंडर की परिभाषा, यानी अपनी लैंगिक पहचान ख़ुद चुनने की आज़ादी। संशोधन के माध्यम से इसी मूल प्रावधान को हटा दिया गया है। अब वही लोग ट्रांसजेंडर हो सकेंगे जो शारीरिक रूप से उभयलिंगी हों, या जो हिजड़ा, किन्नर, अरावनी, जोगता हों। बाक़ी किसी को ट्रांसजेंडर होने के लिए मेडिकल आधार देना होगा, डॉक्टर के पैनल और प्रशासन से अनुमति लेनी होगी। अगर कोई लिंग परिवर्तन की सर्जरी करवाता है तो उसकी सूचना प्रशासन को देनी होगी। यही नहीं, ट्रांसजेंडर के विरुद्ध होने वाले अपराधों की सूची में अब ऐसे प्रावधान जोड़ दिए गए हैं जिनका इस्तेमाल इसी समुदाय और इसके मित्रों के ख़िलाफ़ किया जा सकता है।

एक बार फिर ट्रांसजेंडर समुदाय के जीवन को आपराधिकता के कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। और वह भी बिना किसी चर्चा के। यह संशोधन लाने से पहले सरकार ने ना तो ट्रांसजेंडर समुदाय के किसी संगठन के साथ बात की। ना सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मुद्दे पर बनायी समिति से। और ना ही संसद की समिति में भेजकर इसपर विस्तृत चर्चा की माँग स्वीकार की। इतने लंबे इंतज़ार के बाद तीसरी प्रकृति के लिए खुली इस खिड़की को अचानक बंद कर दिया गया है।

मगर ऐसा क्यों? सरकारी बहाना यह है कि ऐसा इस क़ानून का “दुरुपयोग” रोकने के लिए किया गया है। मगर कोई यह नहीं बता पा रहा की जिस क़ानून का उपयोग ही नहीं हुआ उसके दुरुपयोग का खतरा कहाँ से आ गया? अगर दुरुपयोग का ख़तरा है तो कोई ट्रांसजेंडर व्यक्ति या समुदाय ने शिकायत क्यों नहीं की? अगर यह उनके हित में हैं तो देश भर के ट्रांसजेंडर समूह एक स्वर में इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?

कहीं ऐसा तो नहीं कि खतरा बाहर नहीं भीतर से है? कहीं तीसरी प्रकृति का होना मर्द के भीतर छुपी औरत और औरत के भीतर बसे मर्द की याद तो नहीं दिलाता? कहीं यह एहसास कुर्सी पर बैठे लोगों को असहज तो नहीं कर देता? कितनी बेचारी और घबराई होगी ये मर्दानगी जिसे किसी और मर्द बनाने के लिए क़ानूनी डंडे का सहारा लेना पड़ रहा है।

(योगेन्द्र यादव चुनाव विश्लेषक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं)