निगम पूंजीवाद के खिलाफ मजदूर आंदोलन को नए सिरे से संगठित करने की जरूरत

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दिल्ली Updated On :

नई दिल्ली। विश्व मजदूर दिवस एवं मधु लिमये जयंती के अवसर पर युवा सोशलिस्ट पहल ने राजेंद्र भवन, दिल्ली के सेमीनार कक्ष में 1 मई 2026 को निगम पूंजीवाद के दौर में मजदूर आंदोलन के समक्ष चुनौतियां विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया।

परिचर्चा की शुरुआत ऑल इंडिया महिला सांस्कृतिक संगठन की सचिव रितु कौशिक ने की। उन्होंने कहा कि भारत में सत्ताधीशों ने 8 घंटे काम के लिए निर्धारित न्यूनतम वेतन को नकार कर मजदूर अधिकारों की बेस लाइन को ही काट दिया है। ऐसे में कार्य-स्थल पर उचित सहूलियतें, सुरक्षा और मानव गरिमा की गारंटी जैसे जरूरी प्रावधानों की बात करना ही निरर्थक हो जाता है। राजनीतिक पार्टियां कारपोरेट घरानों द्वारा की जाने वाली फंडिंग से चलती हैं। लिहाजा, वे ‘मजदूरों का ज्यादा से ज्यादा शोषण और कारपोरेट घरानों का ज्यादा से ज्यादा फायदा’ की नीति पर चलती हैं।

राजनीतिक सत्ता और कारपोरेट पूंजी के नेक्सस ने मजदूरों के श्रम और राष्ट्रीय संसाधनों की खुली लूट मचाई हुई है। इस नेक्सस को को तोड़ना मजदूर आंदोलन की जिम्मेदारी है। रितु कौशिक ने यह भी जोर देकर कहा कि महिला मजदूरों की समस्याएं अलग नहीं हैं। महिलाओं की समस्याओं को समग्रता में ही देखना होगा। इस अवसर पर उन्होंने समाजवादी नेता मधु लिमये के पूंजीवादी और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ किए गए सतत संघर्ष का स्मरण किया।

वरिष्ठ मजदूर नेता कामरेड नरेंद्र ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए मजदूरों के वर्तमान हालात को 1991 में लागू की गईं नई आर्थिक नीतियों के साथ जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारत के मजदूर संगठनों और मजदूर नेताओं ने पूंजीवादी शोषण के इस नए चरण का ज्ञान हासिल नहीं किया। उत्पादन के साधनों और उत्पादन संबंधों का नया नक्शा न वे खुद समझ पाए, न मजदूरों को समझा पाए। लिहाजा, वे डिजिटल युग के कारपोरेट-पोलिटिकल नेक्सस का मुकाबला करने में अक्षम साबित हुए हैं। आज के मजदूर आंदोलन को नई परिस्थितियों में नए ज्ञान और रणनीति को अपनाना होगा।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, दिल्ली के अध्यक्ष एडवोकेट अरुण माजी ने 1991 में जारी किए गए डुंकेल मसौदे, जो उरुग्वे राउंड ऑफ दि जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड (गैट) से संबद्ध था, और जिस पर भारत सरकार ने अप्रैल 1994 में हस्ताक्षर किए, का हवाला देते हुए बताया कि उसके बाद दुनिया में उत्पादन का तरीका और संबंध बदल गए। बड़े कारपोरेट दुनिया के श्रम और संसाधनों के मालिक बन गए।

सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और लिमिटेड कारखानों में काम करने वाले संगठित क्षेत्र के मजदूर घटते चले गए। निजीकरण के चलते श्रम शक्ति में बड़े पैमाने पर बिखराव आ गया। इस बिखरी हुई श्रम शक्ति को संगठित करना मजदूर आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

उन्होंने बताया कि मधु लिमये एक प्रखर सांसद होने के साथ संघर्षशील मजदूर नेता भी थे। भारत की राजनीति ऐसे नेताओं से खाली हो गई है। उनके विचारों और संघर्ष को केवल याद करना पर्याप्त नहीं है। मजदूर आंदोलन के सामने दरपेश चुनौतियों को समझने के लिए उनसे प्रेरणा लेने की जरूरत है।

प्रसिद्ध किसान नेता डॉ सुनीलम ने हाल में नोएडा और मानेसर में हुए मजदूर प्रतिरोध के बाद हुई मजदूरों और उनके समर्थकों की गिरफ्तारियों पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अगर बड़ी ट्रेड यूनियनें और विपक्षी राजनीतिक पार्टियां तत्काल मजदूरों के समर्थन और बचाव में उतर पड़तीं तो पुलिस द्वारा की गईं अंधाधुंध एफआईआर रद्द कराई जा सकती थीं और मजदूरों की गिरफ्तारियां रोकी जा सकती थीं। उन्होंने कहा कि हमने मजदूरों को फेल किया है।

उन्होंने मधु लिमये को याद करते हुए समाजवादी आंदोलन और मजदूर आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उनकी अंतिम पुस्तक ‘कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट इंटरेक्शन’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों के बीच एकता बना कर ही कारपोरेट पूंजीवाद के हमले का मुकाबला किया जा सकता है।

वरिष्ठ गांधीवादी विचारक रमेश शर्मा ने उच्च टेक्नॉलॉजी और उसके बाजार का मुकाबला करने की लिए कुटीर उद्योगों के उत्पादों का उपयोग करने की सलाह दी। मजदूर नेता अशोक टाक और वरिष्ठ समाजवादी नेता पुरुषोत्तम ने सीवर मजदूरों की दुर्दशा का वर्णन करते हुए उनकी समस्याओं के अविलंब समाधान की जरूरत पर बल दिया।

मजदूरों की समस्याओं के गंभीर अध्येता वाईएस गिल ने पूंजीवाद के मौजूद दौर को डिजिटल साम्राज्यवाद बताते हुए उसके मुकाबले के नए तरीके ईजाद करने की जरूरत पर बल दिया। भास्कर ने कहा कि पूंजी के बदले हुए चरित्र ने हमारे मूल्य-बोध को भी बहुत हद तक बदल दिया है।

युवा पत्रकार राजेश कुमार ने कहा कि देश का पूरा मीडिया कमोबेश कारपोरेट नेटवर्क का हिस्सा है। सोशल मीडिया भी करापोरेट नेटवर्क से बाहर नहीं माना जा सकता। ऐसे में उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के विकल्प की स्वतंत्र संवैधानिक सोच रखने वाले नागरिक ही संकट का समाधान कर सकते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ प्रेम सिंह ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्रियों को यह बताना चाहिए कि निगम भारत में निजी पूंजी का जो संचय (एकुमुलेशन) हुआ है, और उसका जो गुणगान किया जा रहा है, उसमें मजदूरों के सस्ते श्रम, देश के संसाधनों और खजाने की लूट का हिस्सा कितना है? यह भी बताया जाना चाहिए कि सस्ते श्रम, संसाधनों और खजाने की लूट की छूट किसने दी है?

प्रगतिशील अर्थशास्त्री भी निगम पूंजीवाद के चलते बने मजदूर विरोधी हालातों की समीक्षा तो करते हैं, लेकिन निगम पूंजीवाद खुद कैसे खड़ा हुआ है और बेरोकटोक चल रहा है, इसका गणित स्पष्ट नहीं करते। क्योंकि ‘मानव सभ्यता के विकास में पूंजीवाद क्रांतिकारी चरण है’ यह मोह अभी तक मिटा नहीं है!

उन्होंने कहा कि निगम पूंजीवाद के दौर में श्रम अधिकारों के क्षरण के साथ मजदूरों के बढ़ते शोषण और दमन के कारगर और स्थायी समाधान के लिए नई मजदूर चेतना के उन्मेष की जरूरत है। कोरोना काल में नई मजदूर चेतना के उन्मेष का एक महत्वपूर्ण अवसर आया था। लेकिन उस दिशा में पहल नहीं हुई।

दरअसल, यह काम वर्तमान दौर की राजनीतिक पार्टियां और उनका नेतृत्व नहीं कर सकता। देशी-विदेशी धन लेकर एनजीओ चलाने वाले नागरिक समाज ऐक्टिविस्ट भी यह काम नहीं कर सकते। अपने जन-हित के भाषण अथवा लेखन के बदले भारी-भरकम रकम वाले विदेशी पुरस्कार स्वीकार करने वाले इंडिविजुअल ऐक्टिविस्ट भी इसमें सार्थक भूमिका नहीं निभा सकते।

देश में जो स्थापित परिवर्तनकारी बड़ी और छोटी ट्रेड यूनियन हैं, वे ही श्रमिक-शिक्षण के जरिए नई मजदूर चेतना का निर्माण कर सकती हैं। इसके लिए मजदूर संघों को नए सिरे से संगठित होने और वैचारिक स्पष्टता के साथ आगे बढ़ना होगा। भले ही उन्हें राजनीतिक पार्टियों से अपना संबंध-विच्छेद करना पड़े। मजदूर संघर्ष की राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विरासत पर दृढ़तापूर्वक खड़े रह कर वे नई परिस्थितियों में नई मजदूर चेतना के उन्मेष के स्रोत बन सकते हैं।

मजदूर संगठनों का यह दूरगामी लक्ष्यों को हासिल करने वाला काम है। लेकिन साथ ही उन्हें तात्कालिक लक्ष्य हासिल करने के काम को ज्यादा तेज करना होगा। इसमें हर तरह के मजदूरों के परिवार सहित अच्छे जीवन-यापन के लिए वेतन, सुविधाएं, सुरक्षा, गरिमा की गारंटी सुनिश्चित करना शामिल है।

कहने की जरूरत नहीं कि श्रमिक-शिक्षण के समानांतर समाज-शिक्षण भी होता चलेगा। इस प्रक्रिया से ऐसा राजनीति-शिक्षण पैदा हो सकता है जो वैकल्पिक राजनीति की मजबूत नींव बन सकता है।

इस अवसर पर डॉ राममनोहर लोहिया के 1936 में लिखित ‘श्रमिक-शिक्षण’ नोट का वितरण किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ हिरण्य हिमकर ने किया। डॉ आकाशदीप ने परिचर्चा के अंत में धन्यवाद ज्ञापन किया।

(राजेश कुमार की रिपोर्ट)



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