असम विधानसभा चुनाव की तिथि की घोषणा के बाद असम में चुनावी गर्मी तेज गई है। भाजपा अपनी घेरेबंदी से परेशान है। चुनाव नजदीक आते ही भाजपा ने घुसपैठ और हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलना शुरू कर दिया है। क्या महज हिंदू पोलराइजेशन के बल पर असम में दुबारा भाजपा की सरकार बनने जा रही है?
यह अलग बात है कि असम में भाजपा गठबंधन के खिलाफ बने महागठबंधन ने भाजपा की परेशानी बढ़ा दी है। महागठबंधन में सीपीआई, सीपीएम, सीपीआईएमएल, क्षेत्रीए आंचलिक गणमोर्चा, बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट औऱ बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ शामिल है।
भाजपा के साथ गठबंधन में असम गण परिषद और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल शामिल है। यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल के कारण ही पिछले पांच सालों तक भाजपा के साथ असम सरकार में भागीदार बनी हुई बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट भाजपा से अलग हो गई है और अब कांग्रेस के साथ गठबंधन में शामिल हो गई है। इधर दोनोनं गठबंधन से अलग असम जातीए परिषद और रायजोर दल ने भी अपना मोर्चा बनाया है, सीधे असमिया हितों को बचाने की बात कर रहे है।
असम में भाजपा दुबारा सरकार बनाने की तैयारी में लग गई है। हालांकि सरकार बनाने के लिए भाजपा ने हिंदू कार्ड फिर से खेलना शुरू कर दिया है। क्योंकि हिंदू कार्ड के बिना भाजपा को असम में दुबारा सत्ता प्राप्त करना आसान नहीं होगा। अगर राज्य में मुस्लिम वोटों का विभाजन नहीं हुआ और असमिया हिंदुओं ने भाजपा विरोध मे वोट कर दिया तो भाजपा की मुश्किलें खासी बढ़ जाएगी।
नागरिकता संशोधन कानून ने असमिया हिंदुओं को भाजपा के खिलाफ खड़ा कर दिया है। असमिया हिंदू इस बात से काफी नाराज है कि भाजपा की केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून के माध्यम से उनकी संस्कृति पर हमला किया है। हालांकि नागरिकता संशोधन कानून भाजपा को बराक वैली के उन 15 विधानसभा सीटों पर लाभ देगा जहां हिंदू बंगाली प्रभावी है।
दरअसल असम उन राज्यों में शामिल है जहां मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से ज्यादा है, और काफी सीटों पर हार-जीत का फैसला मुस्लिम वोटर ही करते है। असम 61 प्रतिशत हिंदू, 34 प्रतिशत मुस्लिम है राज्य के कुल 3.5 करोड़ आबादी में 34 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है।
इस बार ऊपरी असम में भाजपा का संकट बढ़ गया है। हिंदू असमिया बहुल उपरी असम की लगभग 36 सीटों पर नागरिकता संशोधन कानून भाजपा के लिए सरदर्द बन गया है। असमिया बहुल सीटों पर भाजपा के खिलाफ जोरदार मोर्चेबंदी हो रही है।
नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बनायी गई नई पार्टियां जिसमे असम जातीय परिषद और रायजोर दल आदि शामिल है, भाजपा को असम विरोधी बता रहे है। उनके खिलाफ असमिया बहुल इलाके में जोरदार प्रचार कर रहे है। इधर कांग्रेस भी असम बचाओ का नारा दे रही है। भाजपा को अपनी इस घेरेबंदी से खासी परेशानी हो रही है। भाजपा इस घेरेबंदी को तोड़ने के लिए कांग्रेस और एआईयूडीएफ की मित्रता पर हमला कर रही है।
दरअसल भाजपा के लिए बुरी खबर भाजपा गठबंधन से बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) का अलग होना है। बीपीएफ कांग्रेस के नेतृत्व वाली महागठबंधन में शामिल हो गई है। बोडो जनसंख्या वाले कोकराझार और इसके साथ के इलाकों में बीपीएफ का अच्छा प्रभाव है। 2005 में बनाए गए इस दल ने पिछले विधानसभा चुनावों में 12 सीटों पर जीत हासिल की थी।
पिछले विधानसभा चुनाव में इसका भाजपा के साथ गठबंधन था। बीपीएफ का भाजपा से अलग होने के संकेत पहले से ही मिलने लगे थे। बीपीएफ का आरोप था कि भाजपा बीपीएफ को बोडो बहुल इलाके में कमजोर करने की साजिश रच रही है। भाजपा ने बीपीएफ के इलाके में एक नया सहयोगी ढूंढ लिया था। बोडोलैंड टेरोटैरियल कांउसिल के पिछले साल हुए चुनाव में भाजपा ने एक दूसरा सहयोगी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल ढूंढ लिया था।
हालांकि टेरोटैरियल काउंसिल के चुनाव में बीपीएफ ने 40 में से 17 सीटों पर जीत हासिल की थी। अभी तक भाजपा को उम्मीद थी कि बीपीएफ कांग्रेस गठबंधन में शामिल में नहीं होगा और अकेले ही चुनाव लड़ेगा। लेकिन अब बीपीएफ ने कांग्रेस गठबंधन में शामिल होने का फैसला लिया है। इसका लाभ कोकराझार इलाके में विपक्षी गठबंधन को मिलेगा इसमें कोई शक नहीं है।
भाजपा की असम में बड़ी चिंता महागठबंधन में शामिल बदरूद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) भी है। य़ह गठबंधन मध्य असम की लगभग 33 विधानसभा सीटों पर प्रभाव डालने की स्थिति में है। इससे भाजपा परेशान है।
मुस्लिम वोटों में बंटवारे के कारण भाजपा को लाभ मिलता रहा है। लेकिन इस बार राज्य में मुस्लिम वोट एकमुश्त महागठबंधन को जा रहा है। असम में मुस्लिम वोट 2005 से पहले कांग्रेस को मिलता था, जिसमें अजमल ने सेंध लगा दी थी। इस बार अजमल मुस्लिम वोटों का विभाजन रोकने के लिए तैयार हो गए है। वे तो यहां तक कह रहे है कि भाजपा को रोकने के लिए वे अपनी हिस्से की सीटों की कुर्बानी भी देने को तैयार है। मुस्लिम मध्य असम की 33 विधानसभा सीटों पर जीत हार तय करते है। भाजपा की घबराहट स्वभाविक और लाजिमी है।
मध्य असम में महागठबंधन को रोकने के लिए भाजपा कम्युनल कार्ड खेल रही है। भाजपा की कोशिश है कि मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर हिंदू वोटों को ध्रुवीकरण हो जाए। भाजपा इसी कारण लगातार अजमल पर हमला कर रही है, और कांग्रेस को भी अजमल के बहाने निशाने पर ले रही है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक रैली में अजमल और कांग्रेस के गठबंधन पर निशाना साधते हुए कहा था कि अजमल के साथ जो बैठे हैं वो घुसपैठ रोक सकते हैं क्या?
दरअसल असम में इस समय भाजपा फंसीं हुई है। बंगाली हिंदुओं को छोड दे तो बाकी तमाम समुदाय भाजपा से इस समय नाराज नजर आ रहे है। नागरिकता संशोधन कानून के कारण स्थानीय असमिया आबादी भी भाजपा से नाराज है।
भाजपा नागरिकता संशोधन कानून के बहाने असम की बराक घाटी में बंगाली हिंदुओं का वोट एकमुश्त जरूर हासिल कर लेगी, लेकिन इससे असमिया हिंदू भाजपा से नाराज हो गए है। अब भाजपा के पास नाराज असमियां हिंदुओं को मनाने का एकमात्र रास्ता हिंदू कार्ड ही है, जिसे मौलाना अजमल का भय दिखाया जा रहा है।
मौलाना अजमल के बहाने कांग्रेस को भी भाजपा इसलिए निशाना बना रही है, ताकि उपरी असम में कांग्रेस को लाभ न मिले। भाजपा को लगता है कि मौलाना अजमल पर तीखे हमलों से राज्य के 33 मुस्लिम बहुल सीटों पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तो तेज होगा ही, ऊपरी असम में भाजपा से नाराज असमिया भाजपा की तरफ लौटेंगे।









