उत्तराखंड कांग्रेस में एकजुटता की बातें अक्सर होती हैं, लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और ही दिखती है। ताज़ा विवाद रामनगर से जुड़ा है। रामनगर के जाने-माने जमीनी नेता और पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी की कांग्रेस में ज्वाइनिंग को लेकर पार्टी के भीतर ही इतना विरोध उठ खड़ा हुआ कि मामला हाईकमान तक जा पहुंचा। नतीजा यह रहा कि संजय नेगी उस जॉइनिंग कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाए जिसमें बीजेपी के छह पूर्व नेता कांग्रेस में आए।
इस पूरे घटनाक्रम से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इस कदर नाराज हुए कि उन्होंने 15 दिन का राजनीतिक अवकाश लेने की घोषणा कर दी और जॉइनिंग कार्यक्रम में खुद भी नहीं पहुंचे। उनकी यह अनुपस्थिति महज संयोग नहीं थी। यह कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी का खुला इजहार है।
रामनगर की राजनीति में संजय नेगी कोई नया नाम नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने रामनगर सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। राजनीति में उनकी जड़ें छात्र जीवन से ही जुड़ी हैं। NSUI से चुनाव लड़ चुके हैं और रामनगर क्षेत्र में ब्लॉक प्रमुख के पद पर भी रह चुके हैं।
2022 में जब कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो वे पार्टी से बागी होकर निर्दलीय मैदान में उतर गए थे। उस वक्त भी यह सवाल उठा था कि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति ने एक मज़बूत स्थानीय नेता को पार्टी से बाहर धकेल दिया।
संजय नेगी सिर्फ चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहे। रामनगर क्षेत्र में बाघ के आतंक से परेशान ग्रामीणों के लिए उन्होंने आत्मदाह की चेतावनी तक दे डाली थी, जिससे वन विभाग और प्रशासन में हड़कंप मच गया था। यह बताता है कि वे महज राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, इस इलाके के सक्रिय जनप्रतिनिधि की भूमिका में रहे हैं।
हरीश रावत की रामनगर में हुई पदयात्राओं में भी संजय नेगी की भूमिका अहम रही है। वन ग्रामों को राजस्व गांव बनाने की मांग को लेकर रावत की पदयात्रा में ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख के रूप में संजय नेगी शामिल रहे थे। यही वजह है कि रावत उन्हें कांग्रेस में लाने के लिए इतने उत्सुक थे।
28 मार्च को दिल्ली में कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय में एक बड़ा जॉइनिंग कार्यक्रम हुआ जिसमें राजकुमार ठुकराल, नारायण पाल, भीमलाल आर्या, गौरव गोयल, लाखन सिंह और अनुज गुप्ता ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। लेकिन जिस नाम का इंतजार हरीश रावत को था वो इस कार्यक्रम से नदारद रहे। संजय नेगी, जिन्हें हरीश रावत का करीबी माना जाता है, आखिरकार कांग्रेस में शामिल नहीं हो पाए। रावत ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर की।
सूत्रों के अनुसार प्रदेश कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता संजय नेगी की ज्वाइनिंग को लेकर शुरू से ही असहज थे। उनका तर्क यह था कि 2022 में पार्टी के खिलाफ निर्दलीय लड़ चुके नेता को इतनी आसानी से वापस नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन हरीश रावत की राय इससे बिल्कुल अलग थी वे मानते हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए रामनगर जैसी महत्वपूर्ण सीट पर मज़बूत जमीनी नेता को साथ लेना ज़रूरी है।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं थे क्योंकि उन्होंने शुक्रवार को घोषणा की थी कि वह राजनीति से 15 दिन का संन्यास ले रहे हैं। इसे उनकी कांग्रेस से नाराजगी के तौर पर देखा जा रहा है। रावत की यह नाराजगी नई नहीं है। उन्होंने कहा है कि पार्टी में नए और प्रतिभावान नौजवानों को राजनीतिक रूप से निखरने का मौका नहीं मिल रहा, जिससे राज्य को नुकसान हो रहा है। संजय नेगी की ज्वाइनिंग को लेकर हुई खींचतान इसी सोच से जुड़ी है।
एबीपी न्यूज़ से खास बातचीत में संजय नेगी ने बेबाकी से कह दिया कि अगर कांग्रेस उन्हें 2027 के चुनाव में टिकट नहीं देती है तो वे अपने समर्थकों के साथ मिलकर किसी दूसरे दल से या निर्दलीय भी मैदान में उतर सकते हैं। यह बयान कांग्रेस के लिए एक साफ संकेत है कि अगर उन्हें नज़रअंदाज किया गया तो रामनगर सीट पर समीकरण एक बार फिर बिगड़ सकते हैं।
2022 में भी यही हुआ था। उस वक्त भी संजय नेगी का निर्दलीय उतरना कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हुआ था जिसका खामियाजा भुगत ते हुए कांग्रेस रामनगर की सीट हार गई।
रामनगर उत्तराखंड की उन सीटों में से है, जहां कांग्रेस लंबे समय से अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है। 2022 से पहले भी रामनगर में कांग्रेस के कई दावेदार थे। कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष रणजीत रावत, उपज्येष्ठ प्रमुख संजय नेगी, पूर्व दर्जाधारी पुष्कर दुर्गापाल और महिला कांग्रेस की जिलाध्यक्ष आशा बिष्ट सभी ने टिकट के लिए दावेदारी की थी। तब भी पार्टी एकमत नहीं हो पाई थी।
अब 2027 करीब आ रहा है और कांग्रेस के लिए यह ज़रूरी है कि रामनगर में एकजुट होकर उतरे। लेकिन जिस तरह संजय नेगी की ज्वाइनिंग को लेकर अंदर से ही पहिए अटकाए गए, उससे यह साफ है कि पार्टी में गुटबाजी अभी थमी नहीं है।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का 15 दिन का अवकाश शायद इसी बात का संकेत है कि पार्टी को अपने घर का झगड़ा पहले सुलझाना होगा, वरना विधानसभा चुनाव में मैदान संभालना मुश्किल हो जाएगा।
