उत्तराखंड सरकार के देवस्थानम बोर्ड को भंग करने के फैसले के बाद भी तीर्थ पुरोहितों का गुस्सा अभी शांत नहीं हो सका है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पुरोहितों का साफ कहना है भाजपा हिंदुओं की ठेकेदार तो बनती है, लेकिन उनके हकों की रक्षा नहीं करती। वह दोहरा रवैया अपनाती है।
उनका कहना हैं कि केरल-तमिलनाडु में मठों और मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त करने की बात करती है, लेकिन उत्तराखंड में उसी की सरकार के मुख्यमंत्री देवास्थानम बोर्ड बनाकर मंदिरों को सरकारी कब्जे में ले लेते हैं। यह तो भाजपा की दादागिरी है न कि वह जो करेगी सही होगा। जब चाहा बोर्ड बना दिया, नुकसान दिखा तो भंग कर दिया। ऐसा थोड़े ही होता है।
आपको बता दें कि उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अगले साल की शुरुआत में होने है। देवनगरी के नाम से मशहूर उत्तराखंड में साधु संतों का बोलबाला है। राज्य में सत्ता तक जाने का रास्ता साधु संतों के मंदिरों और मठों से होकर गुजरता है। लिहाजा उत्तराखंड सरकार ने बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री समेत प्रदेश के 51 मंदिरों को पुरोहित समाज के दो सालों के विरोध के बाद ‘चारधाम देवस्थानम बोर्ड से मुक्त कर दिया है।
पूरा मामला क्या है?
दरअसल उत्तराखंड में त्रिवेंद्र रावत के नेतृत्व वाली सरकार ने उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम-2019 के तहत एक बोर्ड का गठन कर चार धामों के अलावा 51 मंदिरों का प्रबंधन अपने हाथों में ले लिया। इसके पीछे सरकार का तर्क था कि लगातार बढ़ रही यात्रियों की संख्या और इस क्षेत्र को पर्यटन व तीर्थाटन की दृष्टि से मजबूत करने के उद्देश्य के मद्देनजर सरकार का नियंत्रण जरूरी है। सरकारी नियंत्रण में बोर्ड मंदिरों के रखरखाव और यात्रा के प्रबंधन का काम बेहतर तरीके से
