मधु लिमये: स्वतंत्रता, लोकतंत्र व समाजवाद के योद्धा

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मत-विमत Updated On :

स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा तथा समाजवादी चिंतक मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को पूना (पुणे) में हुआ। पूना के फर्ग्युसन कॉलेज में पढ़ाई करते समय ही वे समाजवादी विचारों से प्रभावित हो गए और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के झंडे तले कार्य करने लगे। मात्र सत्रह वर्ष की अल्पायु में वे पार्टी की स्थानीय इकाई के मंत्री बन गए।

सन् 1939 के सितंबर में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। युद्ध विरोधी आंदोलन की अगुवाई समाजवादियों ने की। इसी क्रम में जयप्रकाश नारायण, यूसुफ मेहरअली और डॉ. राममनोहर लोहिया पूना आए। यहीं मधु जी का इन महान समाजवादियों से परिचय हुआ। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही अठारह वर्ष की आयु में वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने कहा -“यह विश्वयुद्ध हमारा नहीं है। अंग्रेजों ने हमें जबरदस्ती इसमें झोंक दिया है। हम युद्ध के लिए न एक पाई देंगे, न एक सिपाही।”

युद्ध विरोधी भाषण देने के कारण उन्हें एक वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाकर धूलिया जेल में बंद कर दिया गया।

1942 में गांधीजी द्वारा ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ का उद्घोष किया गया। इक्कीस वर्ष के मधु लिमये 1943 में इस आजादी की जंग में ‘डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स’ के तहत फिर गिरफ्तार कर लिए गए।

दो वर्ष बाद 1945 में युद्ध समाप्ति के बाद उनकी रिहाई हुई। देश आजाद हो गया था, लेकिन गोवा अभी भी पुर्तगालियों के अधीन था। मधु लिमये ने गोवा की आजादी के लिए संघर्ष किया। पुर्तगाली सैन्य शासन ने उन्हें बारह वर्ष की सजा देकर कैद कर लिया। (वास्तव में उन्होंने गोवा मुक्ति आंदोलन के दौरान 19 महीने से अधिक पुर्तगाली कैद में बिताए।)

मधु जी ने अपना लड़कपन ही आजादी पाने में लगा दिया। आजादी के बाद उनका सम्पूर्ण जीवन भारत के गरीबों, मेहनतकशों, दीन-दुखियों, खेतिहर मजदूरों, दलितों, पिछड़ों तथा अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा में समर्पित रहा।

जब भारत को आजादी मिली, तब लिमये पच्चीस वर्ष के थे। उनकी बुद्धिमत्ता, त्याग और संघर्ष के कारण जयप्रकाश नारायण तथा डॉ. राममनोहर लोहिया उन्हें अपना विश्वसनीय सहयोगी मानने लगे थे। दोनों नेताओं ने उन पर विभिन्न जिम्मेदारियाँ सौंपीं।

पच्चीस वर्ष की आयु में 1947 में उन्हें एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड) में होने वाले सोशलिस्ट इंटरनेशनल सम्मेलन में भारत के समाजवादी आंदोलन का प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया। तत्पश्चात् उन्हें एशियाई सोशलिस्ट ब्यूरो के सचिव के रूप में रंगून भेजा गया। 1949 के पटना सम्मेलन में उन्हें पार्टी का संयुक्त मंत्री तथा केन्द्रीय कार्यालय का इंचार्ज बनाया गया। वे समाजवादी आंदोलन, पार्टी तथा बाद में जनता पार्टी, लोक दल आदि में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहे।

आप कल्पना कीजिए कि मूल रूप से महाराष्ट्र निवासी होने के बावजूद वे चार बार बिहार से लोकसभा सांसद चुने गए। क्षेत्रीयता और जातिवाद उनके विशाल व्यक्तित्व के सामने बौने साबित हुए। भारत के संसदीय इतिहास में मधु जी की भूमिका अविस्मरणीय रहेगी।

अटल बिहारी वाजपेयी ने 13 फरवरी 1995 को लोकसभा में मधु जी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था: “श्री मधु लिमये के साथ मुझे इस सदन में और सदन के बाहर राजनीतिक क्षेत्र में काम करने का बहुत मौका मिला। वे दोनों साम्राज्यवादों से लड़े-अंग्रेजी साम्राज्यवाद से भी और पुर्तगाली साम्राज्यवाद से भी।

उन्होंने जेल की लंबी यातनाएँ सहीं। उसी दौरान उन्होंने अध्ययन और विश्लेषण करने का गुण अर्जित किया। कुछ आदर्शों के प्रति उनकी अटूट आस्था थी। कुछ विचारों के लिए वे प्रतिबद्ध थे। वे प्रखर चिंतक थे, कठोर स्पष्टवादी थे। कभी-कभी उनकी स्पष्टवादिता विवाद खड़ा कर देती थी, लेकिन जो बात वे कहना चाहते थे, वह कह देते थे।

अध्यक्ष महोदय, मुझे याद है कि संसद में जब कोई संविधान की पेचीदा समस्या या नियमों से उलझा हुआ सवाल होता था, मधु लिमये जब उधर से प्रवेश करते थे तो अपने साथ संदर्भ ग्रंथों का एक पूरा पहाड़ लेकर आते थे। उस पहाड़ को देखकर लगता था कि आज दो-दो हाथ होने वाले हैं। सदन को तो कठिनाई होती ही थी, कभी-कभी अध्यक्ष महोदय भी अपने लिए मुश्किल पाते थे। लेकिन वे अध्ययन करके आते थे और अपने पक्ष को तर्कसंगत ढंग से प्रस्तुत करते थे। अब तो इस तरह का अध्ययन दुर्लभ हो गया है। उन्होंने चिंतन और आचरण दोनों का मेल करके दिखाया।”

प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता एवं विद्वान संसद सदस्य हिरेंद्र मुखर्जी ने मधु जी के बारे में लिखा: “लेजिस्लेटिव काम का कोई पिछला अनुभव न होने के बावजूद, लिमये ने जल्द ही अपनी काबिलियत दिखाई और एक होनहार नए चेहरे के तौर पर जल्दी पहचान हासिल की। ​​मधु लिमये ने लोकसभा में आते ही बड़े पैसे के कारोबार के खिलाफ अपने लगातार, दमदार और डॉक्यूमेंटेड हमले से सबको इम्प्रेस किया।”

तीसरी लोकसभा में लिमये ने तहलका मचा दिया। ब्रिटिश अखबार ‘द मेल’ ने उन्हें “माइकल फुट ऑफ इंडियन पार्लियामेंट, रेयरली एवर ऑफ हिज फीट्स” कहा, जबकि फाइनेंशियल टाइम्स ने उन्हें “द न्यू क्रूसेडर अगेंस्ट करप्शन” करार दिया। उन्हें अक्सर “स्किल्ड एंग्री यंग पार्लियामेंटेरियन” कहा जाता था।

इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक तथा प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार श्री एच.के. दुआ ने कहा:

“मधु लिमये में अनेक विशिष्ट गुण थे। मैंने उन्हें संसद में काम करते देखा है। हालांकि उनकी पार्टी के सदस्यों की संख्या ज्यादा नहीं थी, फिर भी तत्कालीन सरकार को वे नियंत्रण में रखते थे। सदन में मंत्री सबसे ज्यादा मधु लिमये से ही सतर्क रहते थे। वे राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति सजग रहते हुए अपने भाषणों के लिए लाइब्रेरी में बेहद मेहनत करते थे। वे जब भी कोई विषय चुनते थे, तो उस पर इतनी रिसर्च करके आते थे कि वे अकेले ही पूरी संसद को झकझोर देते थे। उनकी तीक्ष्ण बुद्धि और विलक्षण प्रतिभा के सहारे सदन में जो सफलता वे पाते थे, वह दुनिया के किसी भी सांसद के लिए ईर्ष्या की बात होती थी। श्री लिमये ने इन गुणों का बाद में पत्रकारिता के क्षेत्र में भी विस्तार किया।”

मधु जी ने अंग्रेजी वर्चस्व तोड़ने के लिए सदैव संसद में हिंदी में ही बोलना पसंद किया। कई अंग्रेजी पत्रकारों ने लिखा कि अगर वे अंग्रेजी में बोलें तो उन्हें ज्यादा प्रसिद्धि मिलेगी, लेकिन वे अपनी भाषा नीति पर अडिग रहे।

वे केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनने पर कई बार मंत्री बनने के आग्रह को ठुकरा चुके थे। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने भी 1980-82 में उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाने का अनुरोध किया, लेकिन मधु जी ने मना कर दिया।

1975 में आपातकाल लगने पर उन्हें भी मिसा के तहत जेल भेज दिया गया। 1976 में जब लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष बढ़ाया गया, तो उन्होंने जेल से ही संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि समय बढ़ाना असंवैधानिक है, मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता। शरद यादव ने भी उनका अनुसरण किया।

स्वतंत्रता सेनानी और चार बार लोकसभा सदस्य रहे मधु लिमये ने किसी प्रकार की पेंशन, भत्ता, ताम्रपत्र या अन्य कोई लाभ नहीं लिया।

वे नागरिक अधिकारों के लिए सड़क से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ते रहे। उन्होंने तेईस बार गिरफ्तारियाँ झेलीं और सुप्रीम कोर्ट में कई बार सफल बहस की।

मधु जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। राजनीति में डूबे रहने के बावजूद उन्हें संगीत, कला, साहित्य, नाटक आदि में गहरी रुचि थी। उनके घर पर प्रख्यात लेखक, पत्रकार, संगीतज्ञ और कलाकारों का हमेशा जमावड़ा रहता था।

सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में अनेक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने अपने बारे में लिखा था: “शेक्सपियर की सभी रचनाओं, महाभारत और ग्रीक दुःखांत रचनाओं के साथ मुझे एकांत आजीवन कारावास भुगतने में खुशी होगी और अगर जीवन के अंत तक मुझे यह अवसर नहीं मिला तो संत ज्ञानेश्वर की रचनाओं को पढ़ने की मेरी प्यास अतृप्त रहेगी।”

वे सादा जीवन जीते थे। उनके घर पर कूलर, एयरकंडीशनर, फ्रिज, टीवी आदि नहीं थे। मेहमानों को मिट्टी के घड़े का पानी, हाथ से बनाई चाय-कॉफी और खिचड़ी परोसी जाती थी।

समाजवादी आंदोलन के इस पुरोधा का 8 जनवरी 1995 को निधन हो गया। उनके अनन्य निकटतम लाड़ली मोहन निगम ने एक वाक्य में उनके जीवन का सार कहा: “उन्होंने अपने जीवन में न्यूनतम लिया, अधिकतम दिया और श्रेष्ठतम जिया।

मधु लिमये आज भी ईमानदार, निडर, अध्ययनशील और सिद्धांतनिष्ठ राजनीति के प्रतीक बने हुए हैं। उनके जीवन से युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिलती रहेगी।