कोविड-19: कोचिंग संस्थानों में छात्रों के न आने से कोटा की अर्थव्यवस्था डूबी

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राजस्थान। कोचिंग उद्योग के चलते शिक्षा के पाटलिपुत्र के नाम से प्रख्यात कोटा की अर्थव्यवस्था में जो ठसक आई थी, वो कोरोना की चपेट में आकर अंतहीन दुस्वप्न में बदल गई है। गगनचुम्बी होटलों, छात्रावासों, ईटिंग जाइंट्स, समेत कोचिंग से जुडे़ लगभग तीन सौ समानांतर उद्योगों में पूंजी निवेश किए कारोबारी पस्ती की हालत में है। कोचिंग के सहारे पूंजी बनाने वाले कारोबारियों को चांदी की चमक ने इस कदर गाफिल किया कि उन्हें करोड़पति हो जाने का गुमान तक नहीं हुआ। लेकिन उनके आनंद की सुखसेज पर सितम तो तब टूटा जब कोचिंग पर कोरोना का कहर टूटा।

आज 24 हजार करोड़ का कोचिंग उद्योग चौपट हो चुका है। एलन और रेजोनेंस समेत कोई आधा दर्जन मुख्य इकाईयों में बंटे कोचिंग संस्थानों ने छोटे-मोटे ऑपरेशन कर लंबे-चैड़े स्टॉफ को उंगलियों में समेट लिया है। भविष्य में फलने की उम्मीदें संजोए कोचिंग संचालक तो डिजिटल शिक्षा की पटरी पर उतर आए हैं। लेकिन कोचिंग की छत्र छाया में किसी भी अनहोनी से अंजान कारोबारी तो कंगाली की दहलीज पर सिर पटक रहे हैं। कोचिंग उद्योग पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले करीब ढाई हजार कारोबारी कर्ज के ढेर में दब चुके हैं और लेनदारों की लानतें झेल रहे हैं।

अर्थव्यवस्था की जरूरी बातों की अनदेखी करने वालों को अब इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। सबसे ज्यादा मार खाने में रियल एस्टेट अव्वल रहा जिसने पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा निवेश किया। छात्रों के आने की उम्मीद में बैंकों से कर्ज लेकर बनाई गई इन विशाल इमारतों में अब कौवे बोल रहे हैं। कोई ढाई लाख लोग बेरोजगारी की चपेट में आ गए हैं। कोटा में हर साल प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग के लिए देश के कोने-कोने से कोई डेढ़ लाख छात्र आते हैं। तीस हजार करोड़ के धक्के से भहराए हुए कारोबारियों को कर्ज का मर्ज बुरी तरह सता रहा है। जोखिम भरे असुरक्षित कर्ज के चलते कुछ कारेाबारी आत्महत्या भी कर चुके हैं। बाजार टूटने से कारोबारियों के हाथ इस कदर जल गए हैं कि उन्हें कोई मरहम भी नहीं सूझ रहा।

कोटा की अर्थव्यवस्था को बड़ा आघात तो नौंवे दशक के उत्तरार्द्ध में भी लगा था। इस दौर में कोटा के सबसे बड़े उद्योग जेके सिन्थेटिक्स के कपाट बंद हो गए थे। कोढ़ में खाज तो तब पैदा हुई जब ओरिएंटल पावर और राजस्थान मेंटल सरीखी आधा दर्जन औद्योगिक इकाईयों के शटर भी गिर गए। कोटा की अर्थव्यवस्था पर बड़ा आघात 2017 में लगा जब कल-पुर्जे बनाकर विदेशों तक में निर्यात करने वाले इंस्टूमेंटेशन लिमिटेड के दरवाजे बंद हो गए। नतीजतन कोई दस हजार कर्मचारी बेरोजगार हो गए।

कोटा की अर्थव्यवस्था में नया युग गढ़ने की शुरूआत आठवें दशक तब हुई जब जेके सिन्थेटिक्स से बेरोजगार हुए वीके बंसल ने एक कमरे में ट्यूशन से कोचिंग की शुरूआत की। बंसल की मेहनत रंग लाई और कोटा वैश्विक फलक में शैक्षिक नगरी की धुरी पर स्थापित हो गया। कोटा व्यापार महासंघ के महासचिव अशोक माहेश्वरी कहते हैं, कोरोना के आघात ने कोटा की अर्थव्यवस्था की चूलें हिला दी है। उनका कहना है, व्यापारियों के गिर्द कर्ज संकट के पलीते सुलग रहे हैं। इस भयंकर संकट के घाट पर फिसलने की बड़ी जिम्मेदारी भी व्यापारियों की है। आखिर क्योंकर वे इस व्यावसायिक मंत्र को भुला बैठे कि निवेश का लक्ष्य सिर्फ इकतरफा नहीं होना चाहिए। ऐसे में अगर किसी एक कारोबार में घाटा हो जाए तो दूसरे कारोबार से उसकी भरपाई की जा सकती है।

माहेश्वरी कहते हैं, “इस घटना ने व्यापारियों को बड़ा सबक दे दिया है कि एक ही कारोबार में भारी भरकम निवेश कर देने का मतलब है खुद अपने लिए ही व्यावसायिक बर्बादी का पेचीदा जाल बुन लेना।” हालांकि इस संताप की बेला में उम्मीदें अभी जिंदा है। लघु और मध्यम औद्योगिक इकाईयों के संगठन के संस्थापक अध्यक्ष गोविंदराम मित्तल कहते हैं, “हर रात की सुबह होती है।’’ उनकी आशावादिता इस तथ्य से जन्मी है कि जेके सिन्थेटिक्स समेत अनेक औद्योगिक इकाईयों के पराभव के बाद भी कोटा की अर्थव्यवस्था आधी हो गई थी। लेकिन आखिर वापस पटरी पर लौटी। हालांकि तमाम नकारात्मक कारकों के चलते कोटा की चरमराती अर्थव्यवस्था अवमूल्यन की तलहटी छू रही है। फिर भी आपदा के इस गुबार में उद्वार की आशावादिता झिलमिल तो करती ही है कि, “शायद कोई हवा चले और पासा पलट जाए”?

(विजय माथुर वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजस्थान के कोटा में रहते हैं।)



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