जंतर-मंतर पर जन-संसद में ‘एक वोट एक रोजगार’ के लिए उठी मांग”


बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है जिसके परिणाम स्वरूप नौजवान अवसाद, नशा, अपराध की तरफ़ बढ़ रहे हैं, हज़ारों की तादाद में पढ़े लिखे नौजवान रोज़गार नहीं मिलने पर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं।


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दिल्ली Updated On :

नई दिल्ली। बेहद खराब मौसम, चारो ओर जल भराव और मूसलाधार बारिश भी देश में लगातार बढ़ती बेरोज़गारी के खिलाफ़ सैकड़ों महिला, पुरुष और युवाओं को देश की राजधानी के जंतर-मंतर पर आयोजित ‘एक वोट एक रोज़गार’ पर आयोजित जन संसद मे इक्ट्ठा होने और रोजगार कानून समेत पांच सूत्रीय मांगों के लिए हुंकार भरने से नहीं रोक पाई।

बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है जिसके परिणाम स्वरूप नौजवान अवसाद, नशा, अपराध की तरफ़ बढ़ रहे हैं, हज़ारों की तादाद में पढ़े लिखे नौजवान रोज़गार नहीं मिलने पर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं।

सरकारी क्षेत्र में जो नौकरियां हैं उन पर बड़ी संख्या में संविदा पर भर्ती की जा रही है, इन पदों पर कार्य करने वाले संविदा कर्मियों को कई साल की नौकरी के बाद अचानक हटा दिया जाता है, कई बार बेरोजगारी की दशा में विस्थापित हुआ यह कर्मी आत्महत्या तक कर लेता है, इसलिए संविदा पर नियुक्तियां बंद हो और जो लोग वहां कार्य कर रहे हैं, उन्हें वहीं स्थायी किया जाए और देश में जितने भी सरकारी पद हैं उन पर तत्काल स्थायी नियुक्ति की जाए।

यदि काम मिल भी रहा है तो सरकार की तरफ़ से तय न्यूनतम मज़दूरी कहीं कहीं किसी दफ़्तर या फ़ैक्ट्री में नहीं मिल रही। आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI) ने अब उच्चतम शिक्षा प्राप्त नौजवानों के भविष्य को भी अंधेरे में डाल दिया है। हमारे बुजुर्गों ने राष्ट्र और समाज का निर्माण अकुशल और कुशल श्रमिकों के रूप में किया आज उन्हें पेंशन नहीं मिल रही और जो पेंशन है भी तो भीख की तरह जिसमें उनका बुढ़ापा दयनीय स्थिति में है , यह भारतीय संस्कृति पर एक भद्दा मज़ाक़ है।

बेरोजगार युवाओं में हताशा, निराशा और कुंठा लगातार बढ़ रही है। कई बार युवा कोई आशा की किरण न दिखने पर मजबूर होकर अतिवादी कदम उठाते हुए अपनी जीवन लीला को समाप्त करने पर मजबूर हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि बेरोजगार, संवेदनशील नागरिक, लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाएं क्योंकि रोजगार मानव की गरिमा के साथ जुड़ी हुई चीज है, जिसकी चर्चा हमारे संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 38 और अनुच्छेद 39 में स्पस्ट रूप में है, आज जरूरत है सरकार द्वारा संविधान में निहित इन नीति निर्देशक तत्वों को कानूनी स्वरुप प्रदान करने की और ‘रोज़गार कानून’ बनाने की।

बेरोजगार नागरिकों का इस्तेमाल कोई भी विघटनकारी शक्ति कर सकती है जो घातक हो सकता है। इस समस्या की संवेदनशीलता को समझते हुए नागरिकों का एक समूह जिसमें समाज के सभी वर्गों एवं समुदायों के नागरिक शामिल हैं, इस मुहिम का नाम है “एक वोट एक रोजगार” का आंदोलन। इस संदर्भ में आज 9 जुलाई 2023 (रविवार) को जंतर मंतर नई दिल्ली पर एक जन संसद का आयोजन किया गया था, जिसमें दिल्ली और देश के अलग अलग क्षेत्रों के युवा, आम जनता, बुद्धिजीवी, समाजसेवी और अलग अलग दलों के संवेदनशील राजनेता शामिल हुए, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में जाने माने अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार, प्रख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर आनंद कुमार, संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य डाक्टर सुनीलम, पूर्व सांसद संदीप दीक्षित, जमाता ए उलेमा हिंद के सद्भावना मंच के राष्ट्रीय संयोजक मौलाना जावेद कासमी, सामजिक कार्यकर्ता सीमा, फिरोज मीठी बोलवाला, रिजवान अहमद, किसान आंदोलन से जुड़ी पूनम पंडित, सुशील खन्ना समेत तमाम लोग शामिल हुए एवं अपनी बात रखी।

हमारी पांच सूत्रीय मांग

1- रोज़गार क़ानून ताकि बेरोज़गार होने पर नेता जी के आफिस नहीं बल्कि कोर्ट जाएं।

2- न्यूनतम मज़दूरी की गारंटी एवं समान काम का समान वेतन।

3- सभी ख़ाली पदों को तुरंत भरा जाए, संविदा प्रणाली समाप्त हो, यदि खाली पदों पर कर्मचारियों की संविदा पर नियुक्त हुई हो, तो उन कर्मचारियों को वहीं स्थाई किया जाए।

4- सभी गांव एवं मोहल्ला में एक रोज़गार कार्यालय।

5- सभी बुजुर्गों को न्यूनतम मज़दूरी का आधा पेंशन।

जन-संसद को आयोजित करने और सफल बनाने में प्रवीण काशी, डॉ. संत प्रकाश, पुष्पा, चांद, जोगिंदर, माही सिंह, जतिन भल्ला, विकास सैनी, शशांक यादव, मंजीत, अशोक कुमार, हरपाल सिंह आदित्य, मोहित सिंह, जोगिंदर, करण समेत अनेकों संगठनों के सदस्यों और बुद्धिजीवीयो ने अहम भूमिका निभाई।



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