सुचेता कृपलानी की 115वीं जन्म-तिथि : स्वतंत्रता आंदोलन और मानव सेवा का वह चमकता हुआ सितारा


गांधीजी से तर्क करना किसी के लिए आसान नहीं था लेकिन सुचेता जी उनसे भी तर्क कर लेती थीं और तर्क में जीतती भी थीं और अंततः अपनी बात मनवाने में कामयाब हो जाती थीं।


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दिल्ली Updated On :

नई दिल्ली। सुचेता कृपलानी भारतीय समाज, राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन और मानव सेवा का वह चमकता हुआ सितारा है जिसकी चमक कभी फीकी पड़ ही नहीं सकती। ये उद्गार वरिष्ठ पत्रकार नीलम गुप्ता ने स्व. सुचेता कृपलानी की 115वीं जन्म-तिथि पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए। संगोष्ठी का आयोजन आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा किया गया था।

स्व. सुचेता कृपलानी की स्मृति में आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए नीलम गुप्ता ने कहा कि 1934 से 74 तक भारतीय राजनीति में सक्रिय रहीं सुचेता कृपलानी ऐसी कर्मयोगी थीं जिन्होंने हर काम शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि और शुद्ध आत्मा के साथ किया। वह जब कोई काम हाथ में ले लेती थीं तो उनके सामने व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं होता था, महत्वपूर्ण होता था काम और लक्ष्य।

जनसत्ता से लगभग तीन दशक तक जुड़ी रहीं नीलम गुप्ता ने आगे कहा कि सुचेता जी में दूरदृष्टि बहुत अच्छी थी और उनमें चीजों को, वस्तुस्थिति को भांपने की क्षमता भी गजब की थी। गांधीजी के मन में क्या चल रहा है, यह समझना किसी के लिए आसान नहीं था लेकिन वह समझ लेती थीं। इसलिए वह गांधीजी की चहेती थीं। उनका आगे कहना था कि गांधीजी से तर्क करना किसी के लिए आसान नहीं था लेकिन सुचेता जी उनसे भी तर्क कर लेती थीं और तर्क में जीतती भी थीं और अंततः अपनी बात मनवाने में कामयाब हो जाती थीं।

स्वतंत्रता आंदोलन में सुचेता कृपलानी के महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा करते हुए नीलम गुप्ता ने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन में सभी बड़े नेता जब जेल चले गए तब किस प्रकार उन्होंने वर्षों तक भूमिगत आंदोलन चलाया तथा अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का भूमिगत दफ्तर बनाकर वर्षों तक उसका संचालन करती रहीं। उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह लगभग चार वर्षों तक सुचेता कृपलानी भूमिगत रहकर रेडियो स्टेशन चलाती रहीं। प्रतिदिन वे बुलेटिन तैयार करती थीं और उसका प्रसारण करती थीं। इस दौरान उन्हें प्रतिदिन जगह और मकान बदलने पड़ते थे। इससे उनके संघर्ष और कार्य क्षमता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए नीलम गुप्ता ने बताया कि नोआखली दंगे के दौरान लगभग पूरे छह महीने तक सुचेता कृपलानी ने दंगा पीड़ितों के बीच राहत कार्य चलाया। इस दौरान उन्होंने दंगा पीड़ितों के बीच 25 राहत केंद्र स्थापित किए थे। उन्होंने यह भी बताया कि देश-विभाजन के दौरान आए हुए शरणार्थियों के लिए सुचेता कृपलानी ने किस प्रकार जून 1947 में ही एक राहत समिति बनाकर दिल्ली में काम करना शुरू कर दिया था। नोआखली में तो उन्हें मां कहा गया लेकिन दिल्ली में राहत समिति के कार्यों को लेकर उन्हें मां और शेरनी दोनों कहा गया।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष  राम बहादुर राय ने कहा कि सुचेता जी का अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व था। कृपलानी जी का जो स्वभाव था सुचेता जी ठीक उसके विपरीत थीं। सुचेता जी बहुत मिलनसार थीं। अगर कोई उनसे सलाह लेने जाता तो उसको वह सही सलाह देने की कोशिश करती थीं। इस दौरान वे अपने शरीर की भी कोई परवाह नहीं करती थीं यानी उनमें कोई नैतिक-आध्यात्मिक शक्ति थी क्योंकि जो महिला मुख्यमंत्री रही हो उससे इतनी उम्मीद करना कठिन है। जब जेपी आंदोलन शुरू हुआ तब सुचेता जी ने अपनी बीमारी का बिल्कुल ख्याल नहीं किया। उनके दोस्त-मित्र और उनको मानने वाले सब कहते थे कि थोड़ा अपना ख्याल रखिए लेकिन उन्होंने यह सोचकर कि इस देश में तानाशाही आने वाली है इसलिए लोगों को जगाना है, छोटी-छोटी सभाओं में जब उनको बुलाया जाता था तो वे वहां उत्साह से जाती थीं जबकि उसके पहले उन्हें दिल का दो बार दौरा पढ़ चुका था।

नई दिल्ली के हिंदी भवन में आयोजित संगोष्ठी में इतिहासविद डॉ. श्री भगवान सिंह, समाजसेवी अशोक शरण, क्रांति प्रकाश, जितेंद्र नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी, ब्रजेश कुमार झा, निशांत कुमार, वैभव सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. राजीव रंजन गिरि, डॉ. मनीष कुमार, डॉ. विपुल राय के अलावा डॉ. रौशन शर्मा, प्रशांत, राकेश रजक, संजय भारतीय, विकास कुमार, सुधीर कुमार वत्स जैसे अनेक बुद्धिजीवी, पत्रकार, प्राध्यापक आदि मौजूद थे।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन एवं सुचेता कृपलानी की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। व्याख्यान के प्रारंभ में आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी अभय प्रताप ने मुख्य वक्ता का संक्षिप्त परिचय दिया तथा अंत में सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. डॉ. राकेश राणा ने किया। संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।



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