पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही सीजफायर वार्ता के टूटने से न केवल पश्चिम एशिया में फिर से मिसाइलों और बमों से वार शुरू होंगे बल्कि पाकिस्तान को एक गंभीर कूटनीतिक और सुरक्षा संकट में धकेल दिया है। पाकिस्तान इन वार्ताओं का मध्यस्थ बनकर वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था। अब वह खुद को दो शक्तिशाली पड़ोसियों और सहयोगियों के बीच फंसा पा रहा है।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर की पूरी टीम इस वार्ता को किसी भी कीमत पर सफल बनाने में जुटी थी, क्योंकि इसके विफल होने का मतलब पाकिस्तान के लिए सिर्फ कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन जाना है। लेकिन, अब वार्ता टूट गई है। अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस वाशिंगटन के लिए रवाना हो गए हैं।
कैसे बढ़ी पाकिस्तान की मुश्किलें
वार्ता टूटने के तुरंत बाद पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ गई हैं। एक तरफ अमेरिका है, जिससे पाकिस्तान आर्थिक सहायता, आईएमएफ जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में समर्थन और सुरक्षा सहयोग की उम्मीद रखता है। दूसरी तरफ ईरान है, जो पाकिस्तान का प्रत्यक्ष पड़ोसी है। दोनों देशों के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील रही है। ईरान के साथ कोई भी टकराव पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को दशकों पीछे धकेल सकता है, क्योंकि सीमा क्षेत्र में पहले से ही अस्थिरता मौजूद है।
वार्ता के बीच पाकिस्तान ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। शनिवार को ही उसने अपने फाइटर जेट्स और सैन्य बल सऊदी अरब भेज दिए। यह कदम 2025 में सऊदी अरब के साथ हुए उसे सुरक्षा समझौते के तहत लिया गया है। इस समझौते के अनुसार यदि सऊदी अरब पर कोई खतरा मंडराता है, तो पाकिस्तान को उसकी सुरक्षा के लिए सैन्य सहायता प्रदान करनी होगी। फिलहाल सऊदी अरब अमेरिका का करीबी सहयोगी है और ईरान के साथ तनावपूर्ण संबंध रखता है।
इस्लामाबाद पर क्यों है ईरानी हमले की आशंका
यदि युद्ध की स्थिति बनी रही तो पाकिस्तान को न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करनी पड़ेगी, बल्कि सऊदी अरब के बचाव में भी सक्रिय भूमिका निभानी पड़ सकती है। इससे पाकिस्तान सीधे तौर पर एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में घिर जाएगा, जहां उसके सैनिक और संसाधन दोनों मोर्चों पर बंट जाएंगे। वार्ता टूटने के बाद अमेरिका अपने सैन्य विकल्पों को फिर से सक्रिय कर सकता है।
ऐसे में अमेरिका पाकिस्तान से एयरबेस और एयरस्ट्रिप्स की मांग कर सकता है, खासकर बलूचिस्तान के पास वाले हवाई अड्डों की। ये बेस ईरान के पूर्वी हिस्सों और उसके परमाणु ठिकानों पर प्रभावी हमलों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। यदि पाकिस्तान यह मांग मान लेता है तो वह सीधे ईरान के निशाने पर आ जाएगा। ईरान पहले ही स्पष्ट चेतावनी दे चुका है कि वह वैसे किसी भी देश को निशाना बनाएगा जो अमेरिका को अपनी धरती का इस्तेमाल करने देगा। इसका मतलब पाकिस्तान के लिए ईरानी मिसाइलों और ड्रोन्स का सामना करना होगा, जो उसकी सैन्य क्षमता और नागरिक बुनियादी ढांचे दोनों को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
कैसी है पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति
पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति भी बेहद नाजुक है। देश में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी रहती है। ईरान के खिलाफ किसी भी प्रकार के सैन्य सहयोग से पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव भड़क सकता है। शिया समुदाय में गुस्सा बढ़ सकता है, जिससे सांप्रदायिक दंगे या इससे भी बदतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। बलूचिस्तान और अन्य सीमावर्ती इलाकों में पहले से ही अलगाववादी और आतंकवादी गतिविधियां सक्रिय हैं। ऐसे में बाहरी दबाव आंतरिक अस्थिरता को और बढ़ा सकता है। सीमा पर तनाव के कारण हॉट बॉर्डर बनने की आशंका है।
पाकिस्तान-ईरान सीमा पर जैश अल-अदल जैसे सुन्नी बलूच मिलिटेंट गुट पहले से सक्रिय हैं। ये समूह दोनों देशों के सुरक्षा बलों पर हमले करते रहे हैं। वार्ता विफल होने और क्षेत्रीय अराजकता बढ़ने पर ये गुट इस अस्थिरता का फायदा उठाकर हमले तेज कर सकते हैं। इससे सीमा क्षेत्र में सैन्य तैनाती बढ़ेगी, संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और दोनों पड़ोसियों के बीच विश्वास की कमी और गहरी हो जाएगी।
क्या अमेरिका को नाराज कर सकता है पाकिस्तान?
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति अत्यंत कठिन है क्योंकि वह न तो अमेरिका को पूरी तरह नाराज कर सकता है और न ही ईरान के साथ सीधा संघर्ष मोल ले सकता है। प्रधानमंत्री शरीफ और आर्मी चीफ मुनीर दोनों ही इस समय तनाव पूर्ण स्थिति में हैं। वे एक तरफ अमेरिकी दबाव को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कूटनीतिक चैनल खुले रखने पर जोर दे रहे हैं। सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाना भी एक दोधारी तलवार साबित हो सकता है-यह सुरक्षा मजबूत करता है, लेकिन ईरान को भड़का भी सकता है।
समग्र रूप से US-ईरान वार्ता टूटने के बाद पाकिस्तान को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां उसकी हर चाल क्षेत्रीय संतुलन और घरेलू स्थिरता दोनों को प्रभावित करेगी। यदि पाकिस्तान सावधानी से आगे नहीं बढ़ा, तो यह न केवल उसकी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को कमजोर करेगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की शांति को भी खतरे में डाल सकता है। इस्लामाबाद अब तेहरान की मिसाइलों के संभावित निशाने पर है, जबकि वाशिंगटन से आने वाले दबाव भी कम नहीं होंगे। पाकिस्तान की कूटनीति की परीक्षा का यह सबसे कठिन दौर है, जहां एक गलत कदम पूरे देश को महंगे सैन्य और आर्थिक परिणामों में झोंक सकता है।
