द. कोरिया में आर्थिक तरक्की से बदली जीवनशैली ने कम किया जन्म और मौत के बीच का फर्क


सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल 2020 में दक्षिण कोरिया में सिर्फ 2,75,800 बच्चों का जन्म हुआ जो साल 2019 की तुलना में 10 फीसदी कम है। वहीं साल 2020 में दक्षिण कोरिया में करीब 3,07,764 लोगों की मौत हुई है।


मंज़ूर अहमद मंज़ूर अहमद
विदेश Updated On :

सियोल। सैमसंग, हुंदै और एलजी सहित तमाम नामचीन कम्पनियों से तकनीकी क्षेत्र में दुनिया में लोहा मनवाने वाला देश दक्षिण कोरिया आज आर्थिक तरक्की के ही दुष्परिणामों से ही बेहाल है। और कुछ दशकों में यदि यहां की परिस्थितियां नहीं बदलीं तो इस देश को अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा।

दक्षिण कोरिया में साल 2020 के दौरान पहली बार ऐसा हुआ है जहां जन्म से अधिक मौतें हुई हैं। जन्म और मौत के बीच के फर्क ने इस देश की चिंताएं बढ़ा दी हैं। सिंगापुर और जापान के बाद दक्षिण कोरिया पहले से ही दुनिया में सबसे कम जन्म दर वाले देशों में शुमार है, लेकिन साल 2000 के इस देश के जन्म और मृत्यु दर के आंकड़ें काफी परेशान करने वाले हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल 2020 में दक्षिण कोरिया में सिर्फ 2,75,800 बच्चों का जन्म हुआ जो साल 2019 की तुलना में 10 फीसदी कम है। वहीं साल 2020 में दक्षिण कोरिया में करीब 3,07,764 लोगों की मौत हुई है। इन आंकड़ों ने दक्षिण कोरिया को अपनी आर्थिक तरक्की से अधिक समाज की तरक्की के लिए बनने वाली नीतियों पर सोचने को मजबूर कर दिया है। जन्म-मृत्यु दर के इन आंकड़ों से भयभीत देश के गृह मंत्रालय ने अपनी नीतियों में ‘आमूलचूल बदलाव’ की बात कही है। 

बुजुर्गों की बढ़ती आबादी से भी परेशानी में सरकार
कोरिया की जनसांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार जन्म-मृत्यु दर के इस रेसियों के कारण देश में बुजुर्गों की आबादी में काफी बढ़ोत्तरी देखनों को मिल रही है। आंकड़ों के अनुसार यहां की 33 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनकी उम्र 40 से 50 साल के हैं वहीं 25 प्रतिशत लोग ऐसें है जो 60 साल पार कर चुके हैं, मतलब देश की करीब 60 प्रतिशत आबादी बुढ़ी हो चुकी है।

बढ़ती उम्र के लोगों की आबादी ने देश के ऊपर अत्यधिक आर्थिक दबाव डाल दिया है। इसके कारण सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन की मद में अधिक राजस्व खर्च करने पड़ रहे हैं दूसरी ओर नौजवानों की कम होती आबादी की वजह से देश में कामगारों की कमी हो रही है। इन दोनों ही वजहों से देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है।

कम जन्म दर की समस्या से निपटने के लिए गत महीने राष्ट्रपति मून जेई ने कई नीतियों की शुरुआत की जिसमें परिवारों को नकद पैसे देने जैसी पहल है। इस योजना के तहत 2022 से हर जन्म लेने वाले बच्चे पर 20 लाख वॉन (दक्षिण कोरियाई मुद्रा) अर्थात भारतीय मुद्रा के हिसाब से करीब एक लाख 34 हजार रूपये की राशि माता-पिता देने की घोषणा की। इसके अलावा एक साल की उम्र तक तीन लाख वॉन प्रति महीने दिए जाएंगे। साल 2025 से यह रकम बढ़ाकर पांच लाख वॉन कर दी जाएगी।

बदला लाइफस्टाइल बना अभिशाप
देश में हुई आर्थिक तरक्की और पैसों की बढ़ी आमद यहां के लोगों की लाइफस्टाइल में काफी बदलाव ला दिया है। दक्षिण कोरिया में पुरुष और महिलाएं काम और जिंदगी की दूसरी जरूरतों के बीच संतुलन बनाने को लेकर जूझ रहे हैं जिसके कारण शादी और परिवार की प्लानिंग के लिए योजना नहीं बना पा रहे हैं। यहीं कारण हैं कि शादी नहीं करने, देर से शादी करने, शादी के बाद भी पालन-पोषण के भय से एक या दो बच्चों की चाह ने यह विषमता पैदा कर दिया है।

हून-उ-किम उन्हीं में से एक हैं। चार भाई-बहनों में वो सबसे बड़ी हैं। उन्होंने खुद के लिए एक बड़े परिवार का सपना देखा था, लेकिन उन्हें उन हालात का सामना करना पड़ा जो दक्षिण कोरिया में परिवार बसाने के लिहाज से माकूल नहीं हैं। वो अब बच्चे पैदा करने के अपने फैसले के बारे में फिर से सोचने पर मजबूर हैं। उन्होंने हाल ही में एक नई नौकरी शुरू की है और वो अब वो मातृत्व अवकाश लेने को लेकर फिक्रमंद हैं। उन्होंने कहा, ‘लोग मुझे कहते हैं कि पहले करियर बनाने पर ध्यान देना सुरक्षित रहेगा।’ 

रीयल एस्टेट की बढ़ती कीमत भी एक अहम मुद्दा है। किम कहती हैं कि प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतों की वजह से भी नौजवान जोड़े परिवार बसाने को लेकर हतोत्साहित होते हैं। वो कहती हैं, ‘बच्चों के लिए जरूरी है कि आपका अपना घर हो लेकिन, दक्षिण कोरिया में यह असंभव हो गया है।’ वो सरकार की ओर से दी जा रही रकम को लेकर भी सहमत नहीं हैं। किम कहती हैं, ‘बच्चे को पालना एक खर्चीला काम है। सरकार की तरफ से कुछ हजार वॉन की मदद से यह समस्या नहीं सुलझेगी।’