केरल में कई धनी ईसाई इस हिन्दू बहुसंख्यकवादी राजनीति के जाल में फँस रहे हैं। यह भी सच है कि ईडी, इनकम टैक्स आदि के कहर से बचने के लिए ईसाई समुदाय के…
लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा का मुकाबला करने के लिए विपक्ष ने ‘इंडिया’ (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूजिव अलाएंस) नाम से गठबंधन बनाया है। कांग्रेस से अलग मोर्चा बनाने कि संभावना अब नहीं लगती।…
प्रधानमंत्री के क्षेत्र में किस प्रकार का आतंक फैला हुआ है इसकी कल्पना प्रधानमंत्री को इन दो घटनाओं से करना चाहिए। मैं चाहूंगा कि वह आगामी मन की बात में इस बारे में…
महात्मा गांधी का शहादत दिवस 30 जनवरी इस महीने के सभी सूत्रों को हमारे गणतंत्र से जोड़ता है। राम के भक्त की हिंदू उग्रवादी द्वारा हत्या राम के नाम पर चल रही समकालीन…
सन 1992 के छह दिसंबर को चुने हुए कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ज़मींदोज़ कर दिया। उन्हें बाकायदा इसका प्रशिक्षण दिया गया था और उन्होंने इसकी रिहर्सल भी की थी। जिस समय मस्जिद…
यह अखबार चार पन्नों का छपता था। हरेक पन्ने में दो कॉलम और 32 लाइनें रहती थीं। इसमें ही मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर सार्वजनिक सूचनाएं छपवाते थे। ये लगभग 21 सालों तक…
सांसदों के निलंबन की कार्रवाई बताती है कि सत्तारूढ़ दल को न सिर्फ़ जनता की ओर से न्यायोचित माँगें उठाने वाले सदस्यों की ज़रूरत नहीं बची, उसका एजेंडा उस जनता के बिना भी…
भारतीय अपने खानपान तथा वेशभूषा के स्तर पर भी सदा भारतीय ही बने रहते हैं। दिवाली और होली, रक्षा बंधन, छठ, करवा चौथ, नवरात्र, शादी समारोह आदि अवसरों पर भारतीय महिलाएं आमतौर पर…
संसद में जो हुआ वह स्पष्टतः कुंठित विद्यार्थियों और युवाओं द्वारा अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त करने का प्रयास था। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो तरीका इन युवाओं ने अपनाया वह सही नहीं…
लोकतंत्र में सार्वजनिक विमर्श का सुर व स्तर सत्तापक्ष निर्धारित करता है, विपक्ष उसका अनुशरण करता है। संसद जिस स्तर तक गिरती है, देश का सार्वजनिक विमर्श भी उतना ही गिरता है।
मुझे कुछ समय पहले मेरे ईस्ट अफ्रीकी देश केन्या के मित्र स्टीफन मुंगा कह रहे थे कि वे अपनी आगामी भारत यात्रा के समय काशी जरूर जाना चाहेंगे। मैंने उनकी काशी के प्रति…
सुरेंद्र मोहन के साथ मेरा नजदीकी संबंध मुलताई पुलिस फायरिंग की 12 जनवरी 1998 की घटना के बाद हुआ। हालांकि उसके पहले हम एक ही स्थान वीपी हाउस में रहते थे। हर दिन…
मेरी राजनीतिक दीक्षा गांधीवादी समाजवादी धारा में हुई, लेकिन आदर्श की राजनीति केवल इस धारा तक सीमित नहीं रही। आजादी से पहले की कांग्रेस और बाद में सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट और जनसंघ में भी बेशुमार नेता…
आखिर अनुच्छेद 370 में क्या खास बात थी जिसकी मांग कांग्रेस तथा कश्मीरी नेता करते रहे हैं? क्या यह सच नहीं है कि अनुच्छेद 370 राज्य को भारत से जोड़ने में विफल रहा…
कांग्रेस की पराजय पर हो रही आलोचना में दो तरह की अटकलें तलाशी जा सकतीं हैं : पहली यह कि तीन दिसंबर के नतीजों के बाद से मोदी ज़्यादा ताकतवर हो गए हैं।…
गांधी-विशेषज्ञों को यह स्पष्ट करना है कि क्या गांधी ने फिलिस्तीन–इजराइल मामले में अरबों की हिंसा पर चुप्पी साधते हुए केवल यहूदियों को अहिंसा का उपदेश दिया है? क्या वे मुस्लिम-यहूदी विवाद में “महात्मा” के आसन…
भारत में अदालती मामलों में फैसला आने में देरी की वजह सभी स्तरों के न्यायालयों द्वारा पीड़ित व्यक्ति या संगठन को न्याय प्रदान करने में होने वाली है। आप जानते हैं कि देश…
हैट्रिक वाले मिथक की जांच के लिए इतिहास की समीक्षा जरूरी है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव के कुछ ही महीनों में लोकसभा का चुनाव पिछले 2 दशक से चला आ रहा है। पिछली…
संघ की पूरी ताक़त के साथ-साथ पड़ौसी प्रदेशों से बुलाकर तैनात की गई कार्यकर्ताओं की फ़ौज चुनाव में झोंक दी गई। नौकरशाही को पार्टी के साथ ‘सहयोग’ नहीं करने के परिणाम के बारे…
विधानसभा चुनावों में भाजपा के धुआँधार प्रचार के दौरान देश की जनता ने प्रधानमंत्री के भाषणों में कांग्रेस के प्रति जिस तरह के क्रोध और वैचारिक हिंसा से भरे शब्दों से साक्षात्कार किया…
डॉ. बद्रीनाथ ने 1978 में मेडिकल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की, जिसकी शंकर नेत्रालय अस्पताल इकाई, एक पंजीकृत सोसायटी और एक धर्मार्थ गैर-लाभकारी नेत्र रोग संगठन है।
आज पूरी दुनिया ऐसी जगह खड़ी हुई है जिसके सामने कोई विकल्प नहीं है। अभी मालूम नहीं कि जाएं किधर? एक लंबे समय से मंदी में फंसी हुई दुनिया जिसका विकल्प न तो…
यह अलग बात है कि राष्ट्रपति शासन लगने के कारण 6 महीने तक ही वो मुख्यमन्त्री रह सकीं। लेकिन उनकी नियुक्ति ने एक मुस्लिम महिला नेता में इंदिरा गाँधी के अटूट विश्वास को…
वर्तमान में पाकिस्तान के भारत और बांग्लादेश दोनों से ही संबंध बेहद ही तनावपूर्ण चल रहे हैं। कमोबेश सांकेतिक राजनयिक संबंधों के अलावा भारत और बांग्लदेश ने पाकिस्तान से दूरियां बनाई हुई हैं।…
सवाल यह है कि आलाकमान (मोदी-शाह) अगर शिवराज का कोई ‘चुनाव जिताऊ विकल्प’ नौ सालों में नहीं खड़ा कर पाया है तो लोकसभा चुनावों के पहले चार महीनों में ऐसा क्या चमत्कार हो…